सामान्यत: किसी भी स्थान पर खड़े हुए गणपतिजी के चित्र, विग्रह, प्रतीक निषिद्ध है
गणेशजी के पुराण लिखते हुए चित्र के उपयोग अध्ययन कक्ष में करना शुभ फलदायी होता है।
व्यापार स्थल पर गणेशजी का बैठा हुआ प्रतीक, चित्र या विग्रह शुभ फलदायी होता है।
गणेशजी का चित्र उत्तर की दीवार पर इस प्रकार लगाना चाहिए जिससे उनका मुंह दक्षिण की ओर न हो।
गणेशजी को काले रंग के वस्त्र अप्रिय हैं
काले रंग का कपड़ा क्षेत्रपाल व शनि देव के अतिरिक्त किसी देवता को नहीं अर्पित करना चाहिए।
गणेशजी का मुंह दक्षिण दिशा में होने से ऋणात्मक प्रभाव मिलते हैं।
पूजन कक्ष में फ्रिज नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
आरती में बत्तियों की संख्या हमेशा विषम अंक में होना शुभ फलदायी होता है।
भगवान को नैवेद्य लगाने के पात्र में स्वयं नहीं खाना चाहिए।
प्रतिदिन आधी घटी अर्थात 12 मिनट से कम ईश्वर की आराधना किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए।
कटा हुआ फल भगवान को नैवैद्य में नहीं रखना चाहिए।
किसी भी शुभ प्रतीक का पूर्ण चित्र ही घर में लगाना चाहिए।
अविवाहित नातिन की मृत्यु का नाना-नानी को सूतक नहीं लगता है।
विवाहित नातिन की मृत्यु का नाना-नानी को सूतक नहीं लगता है
अविवाहित नाती की मृत्यु का नाना-नानी को डेढ़ दिन का सूतक लगता है।
विवाहित नाती की मृत्यु का नाना-नानी को 3 दिन का सूतक लगता है।
- नानी की मृत्यु का अविवाहित पोता-पोती को सूतक नहीं लगता है।
- नानी की मृत्यु का सूतक विवाहित पोता-पोती को डेढ़ दिन का ही लगता है।
- नाना की मृत्यु का अविवाहित पोता-पोती सूतक नहीं लगता है।
नाना की मृत्यु का विवाहित पोता-पोती के दूसरे शहर में होने से डेढ़ दिन का सूतक लगता है।
नाना की मृत्यु का विवाहित पोता-पोती को उसी शहर में रहने से तीन दिन का सूतक लगता है।
- सौतन की मृत्यु का सूतक दस दिन तक रहता है।
पत्नी को पति की मृत्यु का सूतक दस दिन तक लगता है।
अविवाहित बहन की मृत्यु का अविवाहित बहन को सूतक नहीं लगता है।
पति को पत्नी की मृत्यु का सूतक दस दिन का होता है।
अविवाहित बहन की मृत्यु होने पर भाई को दस दिन का सूतक लगता है।
विवाहित बहन की मृत्यु शहर से बाहर अन्य स्थान पर होने से भाई को एक दिन का सूतक लगता है।
विवाहित बहन की मृत्यु एक ही शहर में होने से भाई को दो दिन का सूतक होता है।
कन्या (संतान) का जन्म होने पर सूतिका की (माता की) शुद्धि चालीस दिन पश्चात ही होती है।
पिता के घर अर्थात पति की ससुराल में यदि स्त्री किसी संतान को जन्म दे तो माता-पिता (नाना-नानी) को एक दिन का शौच रहता है।
मृतक संतान पैदा होने पर माता को दस दिन व अन्य कुलजन को भी दस दिन का शौच होता है।
सातवें माह के पश्चात कभी भी प्रसव होने पर दस दिन का शौच कुलजन को होता है।
छ: माह से अधिक व सात माह के मध्य गर्भपात होने पर माता को छ: दिन का शौच रहता है।
पाँच माह से अधिक व छ: माह से कम में गर्भपात होने पर माता को छ: दिन का शौच होता है।
चार माह से अधिक व पाँचवे माह तक गर्भस्त्राव होने पर माता को पाँच दिन का शौच होता है। दिन का पर्व- मत्स्य जयंती।
तीन माह से अधिक व चार माह तक के गर्भस्त्राव होने पर माता को चार दिन का शौच होता है।
पहले तीन माह के अंदर गर्भस्त्राव होने पर माता को तीन दिन का शौच होता है
नवरात्रि के जवारों को बिना स्नान किए स्पर्श नहीं करना चाहिए।
- नवरात्रि के जवारों की प्रतिदिन पुष्प, गंध, अक्षत आदि से पूजन करना चाहिए।
नवरात्रि के जवारे जितने अधिक बढ़ते हैं उतना ही समृद्धि के प्रतीक होते हैं।
नवरात्रि समाप्ति के पूर्व जवारे को तोड़ना या उखाड़ना नहीं चाहिए।
नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारे शुद्ध व नए मिट्टी के पात्र में ही बोना शुभ रहता है।
- नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारों को नवरात्रि समाप्त होने तक ही स्थान पर रखे रहने देना चाहिए।
नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारे गेहूँ के अलावा जौ, चावल अथवा अन्य धान्यों के भी बोए जा सकते हैं।
भवन के अग्नि कोण में पलंग होने से उपयोगकर्ता को नींद में परेशानी आती है
भवन के अग्नि कोण में अंधेरा होने से स्त्री पक्ष को निराशा आने की संभावना रहती है।
उपयोगी ज्ञान- भवन के अग्नि कोण में तरल पदार्थ में सिर्फ ईंधन ही रखना उचित होता है।
भवन के अग्नि कोण में काला रंग होने से कार्य में बाधाएँ आती हैं।
- भवन के अग्नि कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में जल रखने से निराशा आती है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को कार्य पूर्ण होने पर जल में विसर्जन करना शुभ होता है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को जलाने से दोष लगता है व हानि होती है।
उपयोगी ज्ञान- यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र पर खाद्य सामग्री रखने से सेहत में परेशानी आने की संभावना रहती है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को उलटा रखने से ऋणात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को कार्यक्रम पूर्ण होने तक रखना शुभ फलदायी होता है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को तोड़ना, काटना, फाड़ना अशुभ फलदायी होता है
यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र पर लिखना या काँट-छाँट करने से निराशा आने की सभावना बनती है।
यज्ञ आदि पुण्य कार्य का निमंत्रण पत्र हमेशा सम्मानजनक स्थान पर ही रखना चाहिए।
भवन के केंद्र अथवा ब्रह्म स्थान को भाररहित रखना चाहिए।
भवन के पश्चिम दिशा में पूर्व दिशा की तुलना में कम खाली जगह छोड़ना शुभ फलदायी रहता है।
भवन की दक्षिण दिशा में उत्तर से कम खाली स्थान छोड़ना चाहिए।
भवन के दक्षिण दिशा में उन्नत वृक्ष को लगाना अनुकूल फलदायी होता है।
भवन के पश्चिम में बड़े पेड़ों को लगाना शुभ फलदायी होता है।
भवन के पूर्व दिशा में बगीचा अथवा खाली स्थान होना भी उत्तम होता है।
शयन कक्ष के पूर्वी-आग्नेय में लगाया गया दर्पण शुभ फलदायी नहीं होता है।
शयन कक्ष के दक्षिणी-आग्नेय में लगा दर्पण शुभ फलदायी होता है।
शयन कक्ष के दक्षिणी-नैऋत्य में दर्पण लगाना वास्तु दोष कहलाता है।
शयन कक्ष के पश्चिमी-नैऋत्य में दर्पण लगाना शुभ फलदायी नहीं होता है।
शयन कक्ष के उत्तरी-वायव्य में दर्पण लगाना भी शुभ फलदायी नहीं होता है
शयन कक्ष के पश्चिमी-वायव्य में दर्पण लगाना भी शुभ स्थिति में रहता है।
शयन कक्ष के पूर्वी-ईशान में दर्पण लगाना शुभ होता है। लेकिन सोने वाले का अक्स उसमें दिखाई नहीं देना चाहिए।
- शयन कक्ष के उत्तरी-ईशान में दर्पण लगाना शुभ होता है। बशर्ते सोने वाले प्रतिबिंब उसमें ना दिखाई दें।
शयन कक्ष में पलंग के सामने दर्पण होने से उस पर सोने वालों के रोग ग्रस्त होने की संभावना रहती है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र पर आमंत्रित व्यक्ति का पूरा नाम लिखना चाहिए।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र पर पूर्वजों का नाम आदर सूचक प्रकार से लिखना चाहिए।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में गणेशजी का नाम, चित्र या प्रतीक चिह्न होना शुभफलदायी होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में कुलदेव का नाम, चित्र या प्रतीक चिह्न होना शुभ होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में टूटे हुए अनाज, अक्षत आदि का उपयोग नकारात्मक ऊर्जादायक होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में खंडित पत्तियों का चित्र होना नकारात्मक ऊर्जादायक होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में काले धागे का उपयोग नकारात्मक ऊर्जादायक होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में उजाड़ वृक्ष का चित्र होना नकारात्मक ऊर्जादायक होता है।
विवाहादि शुभ कार्य के निमंत्रण पत्र में किसी भी आकृति या लिपि को उल्टा नहीं लिखना चाहिए।
विवाहादि शुभ प्रसंग के निमंत्रण पत्र पर किसी भी शुभ प्रतीक चिह्नों की आकृति को विकृत करना शुभ नहीं है।
विवाहादि शुभ प्रसंग के निमंत्रण पत्र में प्रतीक चिह्नों का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
विवाह आदि शुभ प्रसंग का निमंत्रण पत्र कटे-फटे होना अशुभ माना जाता है।
विवाह आदि शुभ प्रसंग का निमंत्रण पत्र काले रंग का होना अशुभ माना जाता है।
विवाह आदि शुभ कार्य का निमंत्रण पत्र त्रिकोणाकार होना शुभ नहीं होता है।
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दरवाजे के पास लकड़ी या बाँस रखा होना भी अशुभ शकुन होता है।
दरवाजे के पास तेल रखना अशुभ शकुन होता है।
भवन के ईशाण कोण में मिश्रित रंग करने से तनाव होने की संभावना होती है।
भवन के ईशान कोण में चमकीला रंग होने से खुशहाली में वृद्धि होती है।
भवन के ईशान कोण में गुलाबी रंग होने से मन में प्रसन्नता आती है।
उपयोगी ज्ञान- भवन के ईशान कोण में नीला रंग होने से आलस्य बढ़ने की संभावना बनती है।
भवन के ईशान कोण में पीला रंग होने से प्रगति के अवसर आते हैं
भवन के ईशान कोण में सफेद रंग शुभ फलदायी होता है।
ईशान कोण में हरा रंग शुभ फलदायी होता है।
भवन के ईशान कोण में काला रंग मध्यम फलदायी होता है।
पूर्व-उत्तर के कोने (ईशान कोण) में लाल रंग मध्यम फलदायी होता है।
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पूर्णिमा से नए जूते पहनना आरंभ करने से मनोबल में कमी आती है।
अमावस्या से नए जूते पहनना आरंभ करने से आकस्मिक परेशानी आने की संभावना बनती है।
शनिवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करने से कार्य में विलंब से सफलता मिलती है।
शुक्रवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करना शुभ फलदायी होता है।
गुरुवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करने से परिजन का सुख मिलता है।
बुधवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करने से प्रसन्नता मिलने का योग बनाता है।
मंगलवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करने से आर्थिक परेशानी का योग बनाता है।
सोमवार को नए जूते पहनना प्रारंभ करने से शारीरिक सुख आने का योग बनाता है।
रविवार से नए जूते पहनना प्रारंभ करने से मानसिक तनाव आता है।
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कम्प्यूटर पर अधिक समय तक कार्य करना हो तो मुँह पूर्व या उत्तर में रखना चाहिए।
कम्प्यूटर और तरल पदार्थ को एक साथ नहीं रखना चाहिए।
देव स्थान में उपयोग की जाने वाली वस्तु जिस देवता की हो उसी देवता के लिए उसका उपयोग होना चाहिए।
देव स्थान में उपयोग में आने वाली निर्माण सामग्री नवीन होनी चाहिए।
देवता के लिए उपयोग में आने वाले गंध, चंदन, पुष्प का उपयोग देवताओं को अर्पित करने के पूर्व स्वयं नहीं करें।
देवस्थान में जलाएँ जाने वाले दीपक में गाय के घी का उपयोग अति उत्तम होता है।
देवस्थान में अर्पित किया जाने वाला जल उसी दिन जल स्त्रोत से निकला हुआ होना शुभफलदायी होता है
देवस्थान में अर्पण किए जाने वाले पुष्प स्वयं के घर में या पास में रात्रिकाल में नहीं रखना चाहिए।
देवस्थान पर दी जाने वाली पूजन सामग्री का दोबारा उपयोग न हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
देवस्थान पर दान दिए जाने वस्त्र बिना उपयोग किए होना शुभफलदायी होता है।
देवस्थान पर दान दी जाने वाली खाद्य वस्तु का निर्माण स्वयं पवित्रता से करना ही शुभफलदायी होता है।
घर के स्थिर आईने में पूजन सामग्री दिखाई देना शुभफलदायी होता है।
घर के स्थिर आईने में बिल्वपत्र, पान, कंदब का प्रतिबिंब दिखाई देने से शुभफलदायी होता है
घर के स्थिर आईने में पुष्प का प्रतिबिंब दिखाई देने से शुभफलदायी होता है।
घर के स्थिर आईने में शुभ प्रतीक चिह्नों का प्रतिबिंत दिखाई देने से शुभफलदायी होता है।
घर के स्थिर आईने में शुद्ध जल का प्रतिबिंब दिखाई देना शुभ फलदायी रहता है।