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शनिवार, 4 दिसंबर 2010
HOROSCOPE TEVA KUNDLI
पूजा का स्थान कहाँ पर हो किस दिशा में हो
बहूत ही भ्रांतियां हैं
मंदिर या पूजा घर
पूर्व ,उत्तर या इशान में ही होता है ओर होना चाहिए
ओर पूजा करते समय परिवार या सभी भगत जन उत्तर, पूर्व या इशान
दिशा में ही अपना मुहं करेंगे
क्यूंकि जो पूजा का विधान है प्राते काल का है
न की आज की सभ्यता
जो ८ या ९ बजे जगती है
उस के लिए /
क्यूंकि सूर्य प्रकति की अनंत शक्ति से परिपूरन प्रत्यक्ष देवता ग्रेह हैं
जो हमें प्रत्येक क्षण अपनी उर्जा से जीवन देते हैं अतः जिधर भी सूर्य देव हो
उसी दिशा को देख कर पूजा करनी चाहेय /
शुभ समय प्रभात वेला ब्रह्म महूरत के बाद यानि प्रातः काल सूर्य दिशा को ही प्रणाम
किया जाता है.
विशेष >>>>
हम में से कुछ मित्तर मूर्ति पूजा को न मानने की बात करें तो भी हम आप माने या न माने सूर्य
हम सभी को ही नहीं पूरण ब्रह्माण्ड को अपनी उर्जा ओर परकाश देता है
सूर्य को कोई फर्क नहीं पड़ता की आप उसे मानते हैं या नहीं उसका शुभ प्रभाव सब के लिए है
एक बात ओर कहूं नास्तिक ओरा का सन्मान करने वलून से
हम अपने दुश्मन को झुक कर सलाम करते होंगे
पडोसी को भी व्यापारी को भी फिर यह तो देश भी संस्कारों
का देश है फर्क भी क्या पड़ेगा अगर सूर्य देव को प्रणाम कर दे तो ?
सूर्य न हो तो बीज अंकुरित नहीं हो सकता , चंदर देव न हों तो
रस नहीं होगा वनस्पति में अग्नि के बिना क्या संभव होगा सोचो जरा , जल के बिना जीवन भी संभव नहीं हो सकता
तो अगर हम आप इनको प्रणाम करें या भाव अर्पित करें तो कोण सा आपका सन्मान कम हो जाएगा
हमारे ऋषि बहूत बड़े खोजी थे
ऋषि शब्द का अर्थ है {ऋषियों रिसर्च कर्तार} जो पुरुष हमेशा सत्य की ज्ञान की खोज करते रहे वो ऋषि कहलाए
ऋषि कभी गलत नहीं हो सकते ओर शास्त्र कभी निष्फल नहीं हो सकता
यह वाक्य हमें वास्तु का ज्ञान प्राप्त करने से पहले निस्संकोच
सवीकार करनी पड़ेगी
किन्तु- परन्तु अगर मगर
का शब्द हटाना पड़ेगा दिमाग से
नास्तिकता मानव मन की पहली नकारात्मक सोच ही है
नकारात्मक विचार से कभी शुभ फल नहीं मिले किसी को हम सब को इश्वर के कुदरत से जुड़े नियमों को मानना ही होगा बिना शर्त के
तभी हमारे मानवी जीवन को आशीर्वाद मिलेगा कुदरत के बनाए
नियमों के पालन करने से
/
शेष फिर कभी >>>>>>>>>>
वास्तु अवतार
९०१३२०३०४०
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